आज़ादी

आज़ादी

शिवानी त्रिपाठी

भारत तो 1947 मे आज़ाद हो गया था लेकिन नारियों को आज़ादी अभी भी नही मिली इस

पितृसत्तात्मक समाज से।


कब तक अंग्रेज़ शासको की तरह हुकुम चलाएंगे ये लोग हमपे आखिर कब तक?


कब तक जकड़ी रहेंगी औरतें बेड़ियो मे?


कब तक बोला जाएगा उन्हें ये की सुनो ! औरत हो औरत जैसे रहो।


कोई बताएगा आखिर कैसे रहती है औरतें


कब तक सिखाया जाएगा औरतों को की उनके लिए इज़्ज़त से बढ़कर कुछ नही होता


कोई बताएगा क्या होती है इज़्ज़त कहाँ होती है इज़्ज़त और क्यों सिर्फ घर के आंगन से दरवाज़े

तक और दरवाज़े से समाज तक यही होती है इज़्ज़त की रखदार।


पूछा जाता है उनसे की चल रही थी रास्ते मे जिसके साथ क्या लगता है वो तेरा भतार ?


उन्हें सिखाया जाता है बाल लंबे रखना पर कदम छोटे


मुँह मे जवाब रखना पर जवान नही।


बोलते है जवान तो कैंची जैसी चल रही है ज्यादा मुँह चला तो हाथ पैर तोड़के घर मे बैठा दूंगा


अब भी लड़कियाँ मारी जाती है और जो मरती नहीं वो रोज़ जलती है अपनी ही आग मे और जो

मरना पसंद नही करती वो बन जाती है तमाशा इस सामाज के लिए,


कहा जाता है घटिया ,बेशर्म , बेहूदी, बुरी औरते समाज को बर्बाद कर रही है । तो ठीक है मैं

घटिया, बेशर्म, बेहूदी, बुरी ही सही, वो कहते है ना कि अच्छी औरतें स्वर्ग जाती है और बुरी औरतें जहाँ मन करे वहाँ।

Photo by Ibrahim Rifath on Unsplash

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