‘Axone’ : फ़िल्म समीक्षा और विश्लेषण

‘Axone’ : फ़िल्म समीक्षा और विश्लेषण

’Axone’ निकोलस खरकोंगर के निर्देशन मे बनी एक कॉमेडी-ड्रामा मूवी है। जो इस साल जून में नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई है। ये कहानी दिल्ली में रह रहे पूर्वोत्तर के युवाओं के इर्द-गिर्द घूमती है। उन्हें अपनी रोज मर्रा की ज़िंदगी के हर कदम में किस तरह रेसिज्म के कारण विभेद का सामना करना पड़ता है ये दर्शया गया है। यह फ़िल्म कई तरह के सामाजिक मुद्दों को उठाती है और ऑडियन्स को सोचने पर मजबूर कर देती है।इस कहानी को प्यार, दोस्ती, सामाजिक मुद्दे, रिलेशनशिप्स, कमिटमेंट, ग़लतफ़हमी, असुरक्षा, उत्सव सबकुछ मिलाकर बहुत खूबसूरती से एक धागे में पिरोया गया है।

इसमें सभी किरदारों का मानवीय पक्ष हमें देखने को मिलता है। उपासना और चनबी के रूप मे सयानी गुप्ता और लीन लैशराम ने अपनी भूमिका बखूबी निभायी है। वहीं तेनजिन डेल्हा और लानुअकुम ने इनके बॉयफ्रेंड का किरदार निभा कर कहानी मे जान डाल दी है। वहीं विनय पाठक और रोहन जोशी को हमेशा इनकी मदद करते दिखाया गया है।

फ़िल्म में आदिल हुसैन का भी गेस्ट अपीयरेंस है। डॉली अहलूवालिया ने भी फ़िल्म में तेज़, बॉसी मकानमालकिन का किरदार निभाया है। ये पूरी कहानी एक दिन की घटना के चारों और घूमती है। मीनम ( जामीर ) अपने IAS का इंटरव्यू देने गयी है और शाम को उसकी शादी है। उसके दोस्त उसकी शादी को खास बनाने के लिए उसका पसंदीदा पकवान अख़ूनी बनाते हैं (अख़ूनी एक तरह का मसाला होता है जिसे सोयाबीन को सड़ाकर बनाया जाता है जो पोर्क बनाने मे इस्तेमाल होता है, यह नागालैंड का पसंदीदा भोजन है, जो हर शुभ काम पर बनाया जाता है। ) जिसको बनाते समय जो दुर्गन्ध आती है वो बर्दास्त करना मुश्किल हो जाता है। लेकिन ऐसा करते समय उन्हें विभिन्न परेशानियों का सामना करना पड़ता है।उन्हें अपने ही घर मे अपनी जगह के पकवान बनाने की इजाजत नहीं है। एक बहुत ही मामूली चीज़ अपने पसंद का खाना बनाने के लिए उन्हें दिनभर कई तरह की यातनाएं सहनी पडती हैं।

ये फ़िल्म एक बहुत ही सटीक ढंग से बनी हुई है जिसमे एक दम साधारण कहानी के माध्यम से समाज मे व्याप्त कई बुराइयों पर कटाक्ष किया गया है।भोजन किसी भी संस्कृति का एक मूलभूत स्तंभ है जो परंपरा से लेकर कौशल तक सब कुछ पीढ़ी दर पीढ़ी साथ लेकर चलता है। इसीलिये एक पकवान को केंद्र में रखकर हमे उत्तर पूर्वी सभ्यता और उत्तर पूर्वी लोगों के साथ अमानवीय बर्ताव को बड़े सहज ढंग से दिखाया है। एक भोजन के माध्यम से ये उत्तर पूर्वीय लोगो के सामाजिक स्थान और उनके हक जैसे अहम मुद्दों को उठाता है।

उस शहर पर उनका हक जैसी बातों पर सोचने को मजबूर करता है। फ़िल्म के एक दृश्य मे समाज मे व्याप्त सेक्सिसम को भी उजागर किया गया है कि कैसे सड़को पर चलते समय लोगो की गंदी नज़र औरतों को घूरती है। कैसे उनके लिए माल, मलाई, कोका जैसे अभद्र शब्दो का इस्तेमाल किया जाता है। जिसका विरोध करने पर चनबी को हिंसा का सामना करना पड़ता है।

इसमें वहीं फ़िल्म के एक दृश्य पर घरेलू हिंसा की झलक भी देखने को मिलती है जहाँ एक आदमी अपने बेटे के कारण लोगो के सामने शर्मनाक होने पर अपनी बीवी को एक थप्पड़ मारता है। वहीं चनबी को उसी औरत द्वारा उसके बेटे की असलियत बताने पर उसके कपड़ो को इसका जिम्मेदार ठहराया जाता है। “छोटे कपड़े पहन कर हमारे मर्दों को बिगाड़ते हो” इस वाक्य से समाज की संवेदनहीनता और विकृत मानसिकता को उजागर किया गया है, कि कैसे हर बार औरत के चरित्र का आंकलन उसके कपड़ो से किया जाता है और उसे कुलटा बना दिया जाता है।

फिल्म की पृष्ठभूमि में, कहानी में बेंडैंग नामक एक चरित्र द्वारा सामना किए गए नस्लवाद के मामले को भी स्पर्श किया गया है। उसके सिर्फ भूरे बालों के कारण उसे इस प्रकार मारा गया था कि वो मौत के मुंह से बाहर निकल कर आया था। जिसका सदमा आज भी उसके दिल मे घर कर के बैठा है। वो आघात जो वो आज तक नही भूल पाया है, जिसका सामना उत्तर-पूर्वीय लोगों को दिन-प्रतिदिन करना पड़ता है।उसका किरदार अरुणाचल प्रदेश के नौजवान निदो तानीम का एक छोटा सा सन्दर्भ है, जिसे 2014 में दक्षिण दिल्ली के एक बाजार में एक जातिवादी भीड़ ने हत्या कर दी थी।”तुमको इन आँखों से पूरा दिख जाता है ?”, “आप तो सब एक जैसे ही लगते हो” ये कुछ ऐसे वाक्य है जिनको बड़ी सहजता से रखकर निर्देशक ने नस्लीय भेदभाव को दिखाया है।

इसमें मेन्टल हेल्थ के मुद्दे पर भी खुल कर बात की गई है कि कैसे सामाजिक बहिष्कार, रोज-मर्रा की ज़िंदगी में हो रहे भेदभाव, नस्लीय हिंसा का लोगों की मानसिक स्थिति में कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जिसका सामना चनबी और बेंडैंग दोनों कर रहे थे।इस फ़िल्म मे हमे दोस्ती का भी बहुत अच्छा उदाहरण देखने को मिलता है, जहाँ मीनम के सारे दोस्त उसके दिन को खास बनाने में लगे रहते हैं। उनके पास अपनी विविध संस्कृति और अंतर हैं लेकिन शहर की उदासीनता उन्हें एक परिवार के रूप में साथ लाती है।इस फ़िल्म के माध्यम से इंडियन सिनेमा में उत्तर-पूर्वीय लोगों को अहम भूमिका में जगह मिली है जो काफी सकारात्मक कदम है।

इस फ़िल्म की शूटिंग साउथ-दिल्ली के हुमायूंपुर मुनिरका में हुई है जहां बड़ी संख्या में उत्तर-पूर्वी लोग रहते हैं। इसमें बहुत सटीक ढंग से शॉट्स लिए गए हैं, जहाँ दिल्ली की तंग गलियों में बसे लोगों की ज़िंदगी को उकेरा गया है।फ़िल्म में उत्तर-पूर्वीय लोगों के लोकगीत उनकी लोकपरंपरा का भी बेहद ख़ूबरसुरती से प्रयोग हुआ है। बहुत बखूबी नार्थ-ईस्ट की परंपरा, भाषा, संस्कार, रिवाजों को फ़िल्म में चित्रित किया गया है।फ़िल्म मे आखिर में एक बहुत ही सकारात्मक संदेश मिलता है जहाँ बेंडैंग एक हिंदी गाना गाता है वहाँ ये देखा जा सकता है कि कैसे उसपर इतना शोषण होने के बाद भी वो भारतीय सभ्यता को अपना लेता है।

रेसिज्म भारत में एक दैनिक सामाजिक व्यवहार है। कैसे उन्हे उनकी जातीयता, रंग, रूप, भाषा, भोजन, रिवाज़ो के कारण भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। उन्हें अपनी ही संस्कृति और परंपरा को जीने का डर रहता है। ये बहुत ही कटु सत्य को दिखलाता है कि हम चाहे कितनी भी अनेकता में एकता की बात करें, आज भी हमारे समाज में जाति, धर्म, रंग, सभ्यता के आधार पर लोग बटे हुए हैं।कुल मिलाकर निर्देशक ये बताने में बिल्कुल सफल रहे हैं कि कैसे उन्हें हमेशा ये महसूस कराया जाता है कि वो यहाँ के है ही नही। उन्हें हमेशा द्वितीय श्रेणी का नागरिक बताया जाता है। यह फ़िल्म बड़े सटीक रूप मे बेहद जरूरी मुद्दों को सहजता से उठती है।

शिवानी त्रिपाठी

Image source- Netflix

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